खुद से बातें

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खुद से बातें करना  हम भी सीख गये,

अपनी चुप्पी को सहलाते,

मन को बच्चों सा बहलाते,

मन के अंदर एहसास जगे हैं कई नये।

खुद से बातें करना  हम भी सीख गये।

 

मेघ, कोयल, नदी, और उपवन,

संगीत मधुर और कर्कश गर्जन,

छूने लगे कहीं, और मन के तार बजे।

खुद से बातें करना  हम भी सीख गये।

 

बीती बातें, भूले किस्से और धुँधलका,

यादें पुरानी और उजाला हलका-हलका,

अपने से कहने को कितने लफ्ज मिले।

खुद से बातें करना  हम भी सीख गये।

 

किसी मोड़ पर रंज, कहीं पर प्यार,

वादे जुड़े और,  टूटे कितनी बार,

नहीं निभाये रिश्ते भी मीठे जान पड़े।

खुद से बातें करना  हम भी सीख गये।

धड़कन बेकाबू, कितने मन के डर अनजाने,

हैरत भरते, नहीं  समझ आये  अफसाने,

नस नस दौड़े और घुमड़ कर ठहर गये।

खुद से बातें करना  हम भी सीख गये।

 

बिना बंद के गाने, बिन कड़ियों की बातें,

मतलब की तलाश से दूर, बेफिक्री की रातें,

जैसे सब कुछ छोड़, अपने के ही पास हुए।

खुद से बातें करना   हम भी सीख गये।

 

स्वाभिमान से उन्नत  हर सर की इच्छा,

मान किसी का कभी न हत हो ऐसी शिक्षा,

पड़ी रौशनी मन में तो अंदर ये दीख गये।

खुद से बातें करना   हम भी सीख गये।

 

किलकारियाँ बच्चों की जैस बिना अर्थ के,

सबका हक खुश होना हो बिना शर्त के,

जब यह मन में आये लगा कि जीत गये।

खुद से बातें करना   हम भी सीख गये।

दुनियाँ

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ये दुनियाँ कोई सराय नहीं है,

जहाँ रात गुजारने को ठहर गये,

थके तो रुक गये,

और चले जब जी चाहा, पहर दो पहर गये।

 

ये दुनियाँ कोई खेल का मैदान नहीं,

कि जी चाहा तो खेले,

नहीं तो बैठ गये बनके महज एक तमाशबीन,

कि लुत्फ बस मेरा, बाकी जिसका वो झेले।

 

मैदान यह किसी जंग का भी नहीं है,

जहाँ हों बस दो ही खेमे, एक बदी हो एक ईमान हो,

लड़ने या छोड़ने की खुली छूट हो,

और पहले से ही दुश्मनों की पहचान हो।

 

ना ही है यह कोई नुमाइस

रंगबिरंगे खिलौनों की, दिलफरेब और नये-नये,

कि कुछ को देखा, कुछके लिये रोये,

फिर जो मिला, सब कुछ भुला बस उसी के हो लिये।

 

यह बिल्कुल नहीं अनगिनत लहरों का कोई समुंदर,

जहाँ कदमों के निशान बहुत सारे हों,

बिखरी पड़ी खुबसूरती हो, थकाती लहरों की अठखेलियाँ हों,

और जब होश आये तो सुस्ताने को किनारे हों।

 

यह हर ओर जाती हुजूमों का मेला भी नहीं,

जहाँ यूँ तो हर कोई चलता नजर आता है,

पर कोई कहीं पहुंचने की जरूरत में नही दिखता,

गुमनाम सा दिन सारा हैरानी में गुजर जाता है।

 

यह सीधा साधा गणित नहीं, जहाँ दो और दो सिर्फ चार होते हैं,

हल करने के तरीके और जवाब तयशुदा होते हैं,

या फिर किसी रूहानी बहस मुबाहसे की शाम भी नहीं,

जहाँ एक सब एक ही सुर मे बोलते हैं, और सबके खयाल जुदा होते हैं।

 

दुनियाँ इतना ही नहीं, उतना भी नहीं,

यह सब कुछ और औरभी बहुत कुछ है,

जिसे हम छू नहीं पाते हैं, जान नहीं पाते हैं,

जो दिखता नहीं पर मौजूद सचमुच है।

 

यह दुनियाँ दरअसल हम सबको मिली हमारी जिन्दगी है,

बनी चहे जैसे भी, हर पल हमारे हाथों यह बनती है।

 

तुम इसे गुजरगाह नहीं, अगर अपना घर बनाओ,

हँसो, रोओ, लड़ो, खेलो और इसका हिस्सा हो जाओ,

खुद को तलाशो और हो सके तो इस तलाश में खो जाओ,

फिर जब थको तो बिना किसी फिक्र के सो जाओ?

 

तनी हुई रस्सी पर नट के पाँव,

तालियाँ बजाता, तमाशा देख रहा सारा गाँव,

किसको प्यारे ऐसे जमघट नहीं?

फिर क्यौं इस दुनियाँ में तमाशबीन हों हम, नट नहीं?

 

जीना सीखेंगे अगर औरों के जंग देखकर,

चुभता रहे एहसास कि जिन्दगी परायी सी गयी गुजर?

तो बहाना लहू और पसीना अच्छा है,

कीमत की क्या फिक्र, अगर लगे इस तरह जीना सच्चा है।

 

जिद ऐसी कि कोशिश हासिल करने की कयामत तक,

अगर नहीं तो क्या बने और बने ही क्यौं?

खिलौने, खयाल, खूबसूरती, होती सस्ती तो नहीं,

हक जतायें, हम पहले तो उसके काबिल भी हों।

 

यह दुनियाँ दरअसल हम सबको मिली हमारी जिन्दगी है,

समेटो मत सँवारो, कि इसके हुस्न में नहीं कोई कमी है।

चाहतें

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मन के सिलबटों में सोयी    चुप पड़ी जो चाहतें हैं,

क्या हम  इनको चाहते हैं   या ये हमको चाहते हैं?

नासूर पुराने  टीसते,   या उल्लास  किसी कल के,

अलौकिक किस माया से, मिली हम सबको चाहतें है?

 

ललक हर भोले बचपन की,  निर्वाध किलक मनका,

या दुनियाँ बदलने पाने की,   हर यौवन का सपना,

बंद गलियों में गोल-गोल,  खोज अनबुझ संकेतों की,

स्पर्ष सजग मन, पर ज्ञात नहीं कि किसको चाहते हैं?

 

बेसुध  सारी  दुनियाँ से,    किसी  प्रिय को पा जाना,

या छिन्न-भिन्न कर बंधन सब, संधान लक्ष्य कर पाना,

जो सच-सा  दिखता, पर      है धूमिल और निराकार,

प्रश्न  वहीं का  वहीं खड़ा है,   चाहे  जिसको चाहते हैं?

 

स्वार्थ-शून्य  होकर जीने की   जो उठती  तरंगें चंचल,

नयी चेतना  जगा-जगा,  ले  जाती  चरम  शिखर पर,

उन्माद  इन गतियों का   फिर पूछता सहज  मन को,

उन्मेष चाहते हैं हम या,  जगत के  हित को चाहते हैं?

 

सब अपने हों, चाहें सबसे   निजता के बंधन में बंधना,

या सबके  बन  पाएँ हम,   जैसे नभ  सबका  अपना,

भेद तनिक सा क्षद्म है गहरा,  जान कभी पाएँ न पाएँ,

उन्मुक्त भाव  या स्नेह-रुग्न   इस  चित्त को  चाहते हैं?

 

कल हो सुदंर,   दोषमुक्त,   हर मन में पलती ये चाहतें,

हम हों बेहतर, द्वेष रहित जग, मंद मंद जलती ये चाहतें,

संधान स्वर्ग का है उचित,  यदि मूल्य किसीका मान नहीं,

साधन यदि  अधम हैं तो    क्या हम अधम हो चाहते हैं।

 

बंधन जो मन को दे उड़ान, उन्मुक्तता जिससे मुग्ध प्राण,

स्नेह जो न आसक्ति भरे,  संग जो न एकांत में व्यवधान,

चाहत बस  चाहत बोझ नहीं,   आराध्य बना दे कर्म सभी,

स्वप्न लगे पर  आखिर में हम   ऐसा  जाये हो  चाहते हैं।

मिलना अपने आप से

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इतना आसान भी नहीं होता है,

अपने आपसे मिलना।

पहले चश्मा साफ करो,

फिर आईना,

फिर जो नजर आता है,

क्या पता पहचाना जाने वाला हो न हो।

 

वह अगर पहचान में आता है,

तो अच्छा नहीं लगता बिल्कुल,

और अगर अच्छा लगता है,

तो पहचानने में होती है मुश्किल।

यहाँ कुछ भी मान लेने से काम नहीं चलता,

क्यौकि मन अब कठोर हो चुका होता है,

कुछ भी नहीं मान लेता,

सिर्फ अच्छा देख नहीं मचलता है,

उस अज्ञात सच्चे को,

एकबार छूने का हठ जो उसमें पलता है।

 

 

फिर अपना पता ढूंढना होता है।

और इसमे मुश्किल ये होती है,

कि बहुत सारे पता मिलते हैं खुदके,

कहीं वह गाता है, कहीं वह रोता है,

और पूरा का पूरा कहीं नहीं होता है।

पता सब के सब सच्चे हैं,

कई तो रोबदार हैं, अच्छे हैं,

पर सही कौन सा है, निर्णय नहीं होता है,

और आदमी पाने से अधिक अपने आपको खोता है।

 

जो पता सबसे प्यारा लगे,

उस पर अगर हम चल पड़े,

जो मिलता है, प्यारा लगता है,

बड़ा भला पर नि:स्सहाय, बेचारा लगता है,

राम-राम, दुआ-सलाम तक तो बात चलती है,

पर नहीं चलता है ये खेल लम्बा,

जो शुरू से ही हारा-हारा लगता है।

 

अगला पड़ाव जिस कारण भी,

पहली भेंट की निराशा या मात्र जिज्ञासु मन,

हो अपना सबसे अवाछिंत पता यदि,

तो भी चल पड़ते हम आदतन,

 

 

संभव है, घेर ले आश्चर्य,

संशय में मन में बनने लगे नये समीकरण,

“कितना भला तो दिखता है,

क्या बुरा है अगर थोड़ा कठिन और थोड़ा दूर लगता है?”

मन मानने को होता ही है कि मौलिक प्रश्न जगता है,

दूर से देखने को मुलाकात कहने की मजबूरी अगर हो,

तो इसे मिलना हरगिज न कहेंगे, तुम चाहे जो भी कहो।

 

पता तो और भी बहुत सारे हैं,

अधिकतर बिखरे बीच में, कुछेक सुदूर किनारे हैं।

कठिन है,

पर जीवन चुनने की कला है,

जीने की मजबूरी नहीं है।

जीने से पहले अपना सबकुछ जान लेना,

एक असाध्य राग हो सकता है, जरूरी नहीं है।

अच्छा है खुद से हरवक्त मिलो और जीते चलो,

वरना प्रश्न और उत्तर चाहे जितने मिलें,

जिन्दगी से और खुद से खुद की पहचान हो न हो।

फुर्सत और हम

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फुर्सत में अपने आप को देखा,

तो थोड़ा थकमका गया।

बहुत जाना पहचाना था चेहरा,

पर पहचानने में थोड़ा वक्त लगा।

बुरा लगा कि वक्त लगा,

पर सुकून मिला कि वह चेहरा,

चा हे जितना भी बदला हो,

अब भी काफी वैसा ही था।

 

थोड़े कौतूहल और थोड़े अचरज से,

भरा-भरा चेहरा,

कुछ कहने से पहले सोचता,

हिचकिचाता, फिर कहता चेहरा,

भरी दोपहर धूप में चलता,

जलता, फिर भी सपनों में रहता चेहरा,

अधखुली किताब-सा आधी छिपाये,

आधी कहानी को अपनों से कहता चेहरा।

 

 

 

 

किताबों य़े जब धूल हटाई,

एक हैरत अंदर फूट पड़ी।

पढ चुका किसे, किसे छुआ नहीं,

कौन-कौन मिले तोहफे में,

और कौन किसीकी छूट गयी।

इतनी महकें जानी-अनजानी,

इतनी निशानें सीधी-बहकी,

और मुड़े-तुड़े पन्नों की यादें,

कुछ साथ हैं अब भी, कुछ रूठ गयीं।

 

यादें जिंदगी के चहरे हैं,

या कोई तिलस्म का जंगल?

देश काल और पात्रों में उलझे,

बहते जल की धार-सी चंचल।

राह दिखाती, मन भरमाती,

शक्ति श्रोत, पर करती विह्वल।

साँसों जैसी प्राण नियामक,

भाव चक्र का चिरंतन शतदल।

 

यह फुर्सत, और ऐसी खाली पहरें,

एक दूसरे से खेलती लहरें,

जाती कभी भी कहीं नहीं,

पर चलती रहती साँझ दुपहरे।

कितना बीता, कितना बाकी,

कितने परतें, कितने पहरे,

लाख लगाये काले चश्मे,

पर सब कुछ तो कह जाते चेहरे।

आशीर्वाद : एक नव युगल को

 

 

हर पल हर क्षण मंगलमय हो।

देव सदय हों, काल सदय हो,
ख़ुशियों से परिपूर्ण हृदय हो,
हो प्रकाश जीवन में निश-दिन
सौभाग्य का सूर्य उदय हो,
सत्य और निष्ठा पार्श्व उभय हो,
मैं और मैं का हम में विलय हो,
बल, यश, कीर्ति और विनय हो,
युग्म जीवन मंगलमय हो।
हर पल हर क्षण मंगलमय हो।

तत सत

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छल क्षद्म के बल पर,

अपने से बाहर निकल कर,

जितनी भी जीत हुई,

जितनी भी प्रीति हुई,

सबने यह प्रश्न किया,

यह जो मिला क्या मिला?

यदि जारी रहा यह सिलसिला,

तो क्या कभी होगा सम्भव,

अपने मूल रूप को,

अपने अनछुए स्वरूप को,

फिर से ढूंढ पाना अपने भीतर?

 

संयम और स्वभाव में सिमट कर,

अपनी बनाई सीमाओं के भीतर,

जो कुछ भी गढ पाया मैं,

जितना भी बढ पाया मैं,

क्या वह होगा पर्याप्त कभी?

लगता सब कुछ सही सही,

पर प्रश्न अनुत्तरित फिर खड़ा रहा,

क्या इतने मात्र के लिये बना,

यह काल, सृष्टि, शाश्वत और नश्वर?

 

बुद्धि और कौशल से सज्जित,

सम्भावनाओं के पंख पर स्थित,

कहाँ कहाँ तक उड़ता चला,

क्या क्या देखा, क्या जिया, सहा,

कुछ भूला नहीं सब याद रहा,

पर भार यह कौन-सा छाती पर,

पूछता बरबस रह-रहकर,

यह सब जैसा हुआ, हुआ,

इस सब में है तेरा क्या?

क्यौं तुम अकारण इतने भ्रमित।

 

दम्भ कहीं कुछ कर जाने का – भले ही उसमें स्वार्थ न हो,

पिपासा कुछ पा जाने की – चाहे वह होने का अर्थ ही हो,

हठ अपना कुछ छोड़ जाने का – नश्वर में अमरत्व प्राप्ति की,

कुछ भी नहीं पूर्ण स्वयम में – चाहे कुछ भी व्यर्थ न हो।

स्वीकार्य सब साक्षात सतत।

तत सत, तत सत, तत सत।

मैं ने सुना

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हर-कुछ कुछ कहता है ।

हमारे दृष्टि को लालायित नहीं,

सोच की लघुता से बाधित नहीं,

जड़ और चेतन में फर्क नहीं करता,

समय का भी नहीं मोहताज,

बस होने का कथानक चलता रहता है।

हर-कुछ कुछ कहता है।

 

इस अनंत महाकथा में नायक नहीं होते हैं,

इसलिये नहीं कि पात्र इसके लायक नहीं होते हैं,

इसलिये भी नहीं कि होती है प्रतीक्षा

होने की कुछ और भी अद्भुत,

शायद इसलिये कि कभी जरूरत ही नहीं पड़ती इसमें,

किसी शौर्य-गाथा की,

या किसी के महिमा मंडन की,

नहीं किसी पूजा की थाली की,

नहीं धूप दीप नैवेद्य चंदन की,

क्यौंकि इस शाश्त्र में शिल्पकार

ना अपनी प्रतिभा पर इतराता है,

ना पत्थर से बनाये देव प्रतिमा की महिमा बताता है,

इस ग्रन्थ का सार तो बस इतना है,

कि हर पत्थर में प्रतिमा व्याप्त होती है,

और हर पत्थर में सृष्टि विद्यमान रहता है।

हर-कुछ कुछ कहता है।

 

समय

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समय के साथ चलते-चलते,

प्रवाह के साथ बहते-बहते,

कभी डूबकर, कभी तैरते,

कभी उनींदे, कभी सजग मन,

नापना समय को याद रहा,

पर उसे जानना भूल गया।

 

याद रहे क्षण, प्रहर और पल,

खगोल पिंड गति याद रही,

परंतु यह है क्या, क्यौं हमे मिला,

कभी इसकी चर्चा हुई नहीं।

 

आदि हीन लगता अनंत-सा,

अखण्डित, अक्षुण्ण और निरंतर,

पर ज्ञात नहीं यह चलता हमसे,

या सारी सृष्टि है इस पर निर्भर?

 

है श्रोत कहीं जो इसका उद्गम?

बीत गया तो गया कहाँ यह ?

यह चलता है या हम चलते ?

या दोनो ही हैं भ्रम के प्रत्यय ?

 

या अंतहीन यह किसी वलय-सा,

चिरंतन, काल चक्र आवर्ती?

तो क्या हम बस इस गति के हैं इन्धन,

अभिशापित, अर्थहीन, क्षणव्यापी?

 

नाप तौल की बात करूँ तो,

है क्यौं इतना स्थिति सापेक्ष यह?

कभी रुका-रुका सा लगता,

और कभी विषमगति, वक्र, ह्रासमय।

 

प्रश्न बहुत हैं जिन्हे विज्ञान समझे,

पर मेरी एक भोली जिज्ञासा,

मैं समय के गोद पड़ा हूँ,

या है समय मुट्ठी से पल-पल रिसता-सा?

 

अनादि, अनंत, अखंडित, शाश्वत,

अप्रमेय, सर्वग्राही, सर्वत्र विद्यमान ।

समदर्शी, समस्पर्षी, सुलभ सबको एक समान,

हे देवतुल्य, चिरसखा समय, शाश्वत प्रणाम।

शाश्वत प्रणाम ।

 

 

हल्कापन : भारहीनता

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ये जो हल्कापन भर जाता है मुझमें,

रह रह कर

कि मैं अनायास तेज चलने लगता हूँ,

मुड़के पीछे देखना अच्छा लगता है,

रुक जाता हूँ लोगों के साथ होने तक,

अकेले हो जाने का भय नहीं,

आवश्यक किसीका आश्रय नहीं,

अब थकने पर नहीं रुकता,

रुकना व्यवधान नहीं लगता,

साथ सुगम लगता है,

अपना बोझ भी कम लगता है,

जैसे अंतरिक्ष से तरंगें भावपूर्णता की,

आ रही हो मेरी ओर,

बह बह कर ।

यह जो हल्कापन भर जाता है मुझमें,

रह रह कर ।

****************************************
पगड़ी उतार फेकी,

पनही उतार फेकी,

करनी से जुदा सारी

कथनी उतार फेकी,

कंकड़ों को चुभने दिया पावों में,

फर्क करना कम कर दिया,

धूप में और छावों में,

बंद कर दिया खोजना

औरों की आँखों में

अपना कद अपना आकार,

पाँव छिले, ताप लगा,

पीड़ा हुई पर पता चला,

माप तौल के अनगिणत उपकरण,

अनावश्यक मैं ढो रहा था,

और इनके बोझ तले,

क्या कुछ नहीं खो रहा था,

आँकने से मूल्य नहीं बदलते,

समझाता हूँ स्वयं को,

कह कह कर ।

यह जो हल्कापन भर जाता है मुझमें,

रह रह कर ।

************************************

 

बादलों के संग तैरना है,

हवाओं में उड़ना है,

या अनंत प्रकाश भर बाहों में,

किसी ज्योतिपुंज से जुड़ना है।

या फिर सूक्ष्म कुछ ऐसा होना,

कि किरण मूल में झाँक सके,

सृष्टि के उद्गम को परखे,

ब्रह्माण्ड को माप सके ?

अरे नहीं, ये काम अलग हैं,

उत्कृष्ट हैं पर आयाम अलग हैं,

यहाँ तैरना खुशबू जैसा,

यहाँ उड़ान मन की उड़ान है,

न स्प्रिहा न आकांक्षा,

सहज चेतना का वितान है,

सूक्ष्मता यहाँ आकार नहीं है,

आदि अंत का भार नहीं है,

नहीं चुनौती गूढ प्रश्न के

और ज्ञान का अहंकार नहीं है ।

बस मन है, शुचिता है,

सहजता का संबल है,

जो हर लेता है मेरा हर भार,

मेरी सारी कमियों को सह सह कर।

यह जो हल्कापन भर जाता है मुझमें,

रह रह कर ।