महाभोज

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रात ने समेट ली चादर,

बुझा दिये दीये,

किरणों की आहट सुन सकती वह,

सवेरा जरूर ही पास है।

यह उसके मन का विश्वास है।  

अंधेरे ने ली करवट,

दूसरी ओर मुँह करके लेटेगा,

उसका मानना है कि उजाले की तरह,

उसकी भी चाहत होगी किसीको,

अलग बात है कि, कहीं भी उसे मिला नहीं,

इसका प्रत्यक्ष प्रमाण।

शायद इसीलिए अंधेरा बेचैन है,

चिर काल से तृष्णा में हैं उसके प्राण।

सूरज के घोड़ों पर सवार,

उजाला आतुर मन, बार-बार सोचता है,

क्यों रहे ये घोड़े चल इतने मंद-मंद,

नींद तोड़ जग प्रतीक्षा में व्याकुल है,

ऐसा भाग्य कितना विरल है।

किरणें भाव विह्वल हैं।

समय,

समस्त सृष्टि के कथानक बुनता,

चुपचाप निश्चल अवलोकन में,

देख रहा है,

हर अणु है गतिमान, सबकुछ बदल रहा है,

और सब सोचते हैं कि वह चल रहा है;

अस्तित्व का, भावों का, घटनाक्रम का,

हो जैसे एक अनियंत्रित महाभोज रहा है,

जिसमें हर कोई अपना अर्थ खोज रहा है।

ऋण-धन

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नन्हे शिशु-सा आकुल हो मन,

पूछे हर पल, कैसा हो जीवन?

कैसे हो सकती है गणणा,

क्या इसके ऋण, क्या इसका धन?

जीवन में जब कुछ भी घटा,

तो कुछ और पन्ने जुड़ गये,

यह गणित समझना बाकी था,

कि कई प्रश्न खड़े हो गये नये।

जुड़ा जहाँ कुछ समझ न आया,

आकार बढा या भार बढा,

भ्रम में मन, उत्तर दे कोई,

है गंतव्य सही जो मैं ने गढा?

‘गंतव्य कहाँ?’ एक ज्ञान दे गया,

लक्ष्य और स्पृहा भिन्न-भिन्न हैं,

संधान प्रथम का जीवन यात्रा,

दूसरा एक चक्रव्यूह अंतहीन है।

पीड़ा चेतना में चुभती-चुभती,

बनी सदा हृदय के पास रही,

कहा ‘तुम मुझे सहते निश्चय ही,

मैं तुझमें बुनती विश्वास रही।‘

उल्लास, तुम मेरे आराध्य हो,

मन बसो, परंतु इतना करना,

समृद्धि भाव का देना पर,

विवेक कभी बाधित ना करना।

सहज, सरल हो जीवन परंतु,

इसका भी अभिमान न हो,

कलुष मिटाने की शक्ति हो,

सामर्थ्य कभी निष्प्राण न हो।

जिन्दगी जब बहलाती है

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जिन्दगी जब बहलाती है,

थपकियाँ देते हुए हल्के-हल्के सहलाती है,

वह तुमसे प्यार तो करती है,

तुझे तैय्यार भी करती है,

आने वाले कल के लिये,

और उनमें छुपी हलचल के लिये।

जिन्दगी जब एकरसता से चलती है,

न मुड़ती है कहीं, न करवट बदलती है,

देती है एक सुकून का एहसास,

जो कभी खत्म नहीं होती है;

तो शायद कहती है,

कि आगे कोई चुनौती है;

जो कर रही है तुम्हारा इंतजार,

छोड़ो यह खुमार, चलो अब सपनों के पार।

जिन्दगी जब रुकी-रुकी-सी लगती है,

तुम्हारे सजदे में झुकी-झुकी-सी लगती है,

शायद कह रही होती है,

क्यों अपना वजूद खो रहे हो,

क्या है जो समझ नहीं पा रहे,

दिन चढ आया बेसुध सो रहे हो।

जिन्दगी ‘होना’ है,

साँसों के धागे से हर पल बुनती माया है,

वजूद से जुड़ी,

दुनियाँ पर पड़ने वाली हमारी छाया है,

उलझे सवाल नहीं, सुलझाते जवाब नहीं,

सिर्फ हकीकत या सिर्फ ख्वाब नहीं,

जहाँ सारे किनारे मिलते हैं,

यह वह जमीन है,

सब पर भरोसा है, अपने पर यकीन है;

वह सब जो हम समझ नहीं पाते और जो समझ आया है,

जिन्दगी वही है जो हमने खुद को बनाया है।

जिन्दगी सहपाठी है, गुरु है, पाठ है,

उम्मीदों की आखिरी गाँठ है,

सिखाती है, पढाती है,

कभी छोड़ती नहीं,

अंत तक साथ निभाती है,

जब भी लगता है दुहरा रही है खुद को,

अचानक एक नये रंग में आ जाती है।

ओस की बूंद

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ओस की बूँदों नें,

घास की झुकी नोकों से उतरते हुए,

अपना सफर खत्म करते हुए,

जड़ों में समाने से पहले,

आखिरी बार अपनी तरलता

महसूस कर पाने से पहले,

कहा, बहुत कुछ करता याद,

चलो इतने लम्बे सफ़र के बाद,

एक चक्र पूरा हुआ।

बस शुरू होने को एक नया।

मिट्टी के कणों में समाहित,

मिट्टी का ही अंश,

नहीं अलग से परिभाषित,

अंधकार ही जिसका संसार था,

किसी और में विलीन जिसका आकार था,

मात्र होना था, होने का ज्ञान नहीं था,

ना अस्तित्व,

ना ही इसकी सम्भावनाओं का कोई विचार था।

कुछ ज्ञात नहीं,

पर कुछ हुआ कहीं,

एक सूक्ष्म स्पंदन का संचार हुआ,

एक गति, एक दिशा और एक उद्देश्य

अकस्मात साकार हुआ।

भले अत्यंत जटिल थी राहें,

थी शक्ति कोई जो ले चलती थी,

बहती सूक्ष्म रंध्रों में थी,

किसीके प्राणों में वह पलती थी।

इस होने में एक बंधन था,

और उस बंधन में भी सुख था,

खुशी बहुत, कि कारण है किसी जीवन का,

पर गहरे कहीं कुछ था जो अब भी विमुख था।

मोह बंधन का चुक जाता है,

कुछ दूर चलकर रुक जाता है,

सम्मोहन खुलकर जी पाने का,

दुस्सह फिर भी मन भाता है।

अंत:स्थल के रंध्रों से चलकर,

निकल आना हरे मृदुल सतहों पर,

बोध था उन्मुक्ति का नया-नया,

नये भावों एक नया संसार मुखर।

पवन का हिंडोला, सूर्य के किरणों की छुअन,

कभी मृदुल पोषण, कभी अस्तित्व को जूझता जीवन,

था कृतकृत्य मन, थोड़ा असहज, पर पुलक भरा;

पर अब लगी लुभाने क्षितिज की सीमाएँ हर क्षण।

फिर एक दिन चाहे-अनचाहे,

पवन के कंधों पर, किरणो के संग,

उड़ चला, ऊपर, बहुत ऊपर,

लिये नया रूप, जैसे एक उन्मुक्त तरंग।

क्षितिज को देखा, उस के पार देखा,

घूमा अनंत में बिन लेखा-जोखा,

चाह हुई हर पूरी,

पर विस्मय,

उसे अपनी ही भारहीनता ने टोका।

बहुत हुआ बिन उद्देश्य घूमना,

ढूँढ प्रयोजन अब कोई अपना,

शेष जीवन यदि इसी गति चला तो,

क्या होगा उचित इसे जीवन कहना?

कहाँ-कहाँ उड़ता फिरा,

ज्ञात नहीं, पर फिर कुछ ऐसा लगा,

चाह रहा वह अपने भार का अनुभव,

और शनै:-शनै: विस्तार संघनित होने लगा।

आभास कर एक वांछित दबाव,

जैसे नया अर्थ कोई, नया एक भाव,

स्पर्श पाकर तृण के कोमल कोपल का,

बूंद बन ठहर गयी वहीं,

और घास थोड़ा झुकी उसके प्रभाव।

पूरा हुआ एक चक्र जीवन का ।

अर्थ हीन या बहुत गूढ है,

प्रश्न शेष यह शंकित मन का।

दिशा

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चाहे जैसे भी बंधन हों,

जैसी भी हो पराधीनता,

अंतत:, अपनी दिशा चुनने का अधिकार,

हमसे कोई नहीं छीनता।

हम चाहे जो भी कथा गढें,

अपनी वेदना पर चाहे जितनी भी महिमा मढें

हर कल पर आज की छाया है,

जो बोया था कभी, फल उसी का पाया है।

दिशा को चुनने का विकल्प,

होता है मात्र दिशा हीनता।

पहला बंधन, पर जीवन;

दूसरा अर्थहीन और निष्कृय स्वाधीनता।

जो भी पास नहीं होता,

मन उसी में आकर्षण पाता है।

पर चुन सकने का अधिकार तज कर,

मनुष्य जी पाने की संभावना ही हार जाता है।

उद्देश्य जीवन का कहाँ,

ढूढते रहते हैं जीवन की परीधि पर,

उसके मिलने के अवसर जबकि,

होते हैं जीवन में हर पल के अंदर।

हर बार मना लेता है

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जंग जिन्दगी का मुझसे माँग क्या-क्या लेता है,

एक मेरा दिल है कि मुझे हर बार मना लेता है।

सिर्फ जख्म ही नहीं मरहम भी दिये हैं इसने,

मना करता रहूँ फिर भी हाथों से लगा देता है।

एक मैं हूँ कि दुनियाँ से अदावत किये बैठा हूँ,

एक वो है कि किसीसे भी अपनापन जता लेता है।

सहमा-सहमा-सा मैं मुड़ के  लौट जाऊँ कहीं से,

इससे पहले ही कदम अपना वो आगे बढा लेता है।

मायूस न हो जाऊँ देख उसकी आँखों में आँसू मैं,

जब भी रोता है तो अपना चेहरा छुपा लेता है।

जब भी पनाह आँखों में नींद को नहीं मिलती है,

चुपके से उन्हें अपने घर का पता बता देता है।

मैं चूक भी जाऊँ तो कोई रंज नहीं होता उसको,

बड़े खयाल से मेरे गुनाह आगोश में छुपा लेता है।

अपने सपनों से डर के जब भी जगता हूँ अंधेरों में,

फेर हाथ सर पे मेरे अपनी बाहों में सुला लेता है।

जब भी भूलता हूँ किसी दर्द से अपने रिश्ते को,

उस दर्द का हासिल मुझे सिलसिलेवार बता देता है।

है बड़ी छोटी-सी चीज अदावत कर लेना यारों,

बड़े मुहब्बत से मुझे हर बार ये समझा लेता है।

मुकम्मल होने की जद्दोजहद में मुझको पा कर,

मुस्कुरा के मेरी कोशिश को मुकम्मल बना देता है।

मेरी खुशियों में शरीक हुए हैं कई हमसफर यूँ तो,

एक यही है कि गम में भी चार चांद लगा देता है।

आरजू यही कि वह रूठे नहीं मुझसे कभी भी,

जब वो रूठता है तो मुझे अजनबी बना देता है।

हे बोधातीत

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एक मैं हूँ जो भूलता रहता हूँ,

और एक तुम हो जो बस मुस्कुराते रहते हो;

इस ओर मैं कुछ नहीं कहता,

उस ओर तुम मेरा कुछ भी सुनने आते रहते हो;

मैं अनायास ही भटकता हूँ,

तुम उतनी ही तत्परता से प्रकाश दिखाते रहते हो;

मेरी उच्छृंखलताएँ जो किसी को नहीं भातीं,

कितनी सहजता से सहते हो।

मुझे वास्तविक विस्मय किंतु इस पर होता है,

कि तुम मुझे कुछ भूलने से भी नहीं रोकते हो;

असमय चुप रहने की उदंडता करता हूँ,

तुम कभी नहीं टोकते हो;

मेरे भटकने को भी सहज स्वीकारते हो,

आश्चर्य कि इतने सहिष्णु कैसे हो सके हो?

सीमाओं को छू पाने की मेरी लालसा,

मेरी धृष्टता को बढाये चली जाती है;

पर हर बार तुम्हारी क्षमा,

मेरे अपराध से बड़ी हो जाती है।

बंधनों को तोड़ने के हठ ने,

कई बार तुम्हारे विधान का अतिक्रमण किया है;

कभी नियमों अर्थ बदल,

कभी सुझा कर नये हल,

तुमने मेरे चित्त के उद्वेग का शमन किया है।

सृजन को मान अपना अधिकार,

प्रमाद में,

मैंने विध्वंस का भी निर्माण किया है;

कितने वत्सल भाव से तुमने उन्हें भी,

अंगीकार कर,

उन्हें एक नया नाम दिया है।

एक मैं हूँ, जो अधिकार दिखाने से,

कभी चूकता नही हूँ;

एक तुम हो कि उपकार कर पाने में,

कभी रुकते नहीं हो।

अब तक ऐसा कुछ भी घटित नहीं,

जिसमें मैं तुझे पहचान नहीं पाया हूँ;

लज्जित हूँ, पर सत्य है कि,

तुम कौन हो जान नहीं पाया हूँ।

सच कहूँ मेरे सबसे बड़े धन्यता के हैं,

वह कुछेक क्षण;

जब मैं मान लेता हूँ कि तुम हो ही नहीं,

और तुमने मेरे इस अहंकार को स्वीकार कर,

पूरा इतिहास भुला कर,

दिया है मुझे अकलुष नवजीवन।

जीवन के कुछ परिचय

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जो पाँवों के नीचे होता है,

वही आधार होता है;

भ्रम में मत रहो,

सर के ऊपर तो भार होता है।

आँखें चाहे जितना भी समा ले अपने में,

मन के अंदर ही बसा हुआ,

जीवन का पूरा विस्तार होता है।

किसी तक चल कर जाना,

किसी को छू कर,

दोनों के होने का एहसास दिलाना,

आँखों से कुछ कह पाना,

और साँसों की समता में,

चेतना का साक्षात लय पाना;

ये ही कुछ जीवन के परिचय हैं;

शेष कवच, कुंडल,

महिमा मंडल,

और आवरण में खुद को,

छिपाने के निर्णय हैं।

हाथों से छू पाना,

जैसे कि सचमुच जान जाना,

सबसे अधिक जीवंत अनुभूति, स्पर्श होता है;

मूर्त-अमूर्त का मिलन,

जैसे क्षितिज पर मिलते धरती गगन,

पहुँच पाना ऐसी जगह,

जहाँ संवेदना को आकार मिलता है,

निराकार और प्रत्यक्ष का संघर्ष होता है।

आगे बढते कदम,

कभी तेज-तेज, कभी हिचकिचाते;

त्याग सारी शंकाओं को,

पथ के काँटो की चुभन को झुठलाते;

कभी अहंकार छोड़,

और कभी तोड़ संयम के बंधन को,

जब पहुँचते हैं किसी तक;

अर्थ देते हैं जीवन को,

बस अपने में ही हो कर,

जियो मत निरर्थक।

गति ही तो चेतना का प्रमाण है;

अन्यथा समय तो उन जगहों पर भी गुजरता ही है,

जहाँ सबकुछ जड़ है, गतिहीन पाषाण है।

साँसें कभी सम, कभी मध्यम,

कभी बहुत ही गहरी,

हर रूप में लय से भरी,

प्राण की सहचरी;

कोई आमंत्रण नहीं, तिरस्कार नहीं,

अनवरत चलती, कभी थकती एकबार नहीं,

जीवन की पहली लय,

जीवन के आखिरी छंद;

साँसें एकसूत्रता के परिचायक,

समता के वाहक और स्वच्छंद।

पलकें उठी हों तो दूर तक दिखाई देता है,

पर ऐसे में सिर्फ देखना होता है,

जैसे सब कुछ समेट लेना अपने अंदर;

कोई वाद नहीं, विवाद नहीं,

कोई तर्क नहीं,

बस एक सुख है निहारना, वर्तमान को जी भर;

झुकी हों, तो कम दिखता है,

पर देखने से अधिक कहती हैं;

जैसे एक जुड़ाव हो,

हर देखने में एक भाव हो,

भावनाएँ जो कहीं पहुँचे ना पहुँचे,

आँखों से बहती हैं,

पलकें जब बंद होती हैं,

सब कुछ समेट लेती हैं,

कुछ भी कहीं बदलता नहीं,

कुछ भी रुकता या चलता नहीं,

निस्पृह संवेदना,

कि सारी सृष्टि को यूँ हीं छोड़ देती हैं,

फिर भी सहजता से उसे हमसे जोड़ देती हैं।

बस इतना ही

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सारी बाधाओं को पार कर,

मन को असंख्य दुविधाओं से उबार कर,

कदम दर कदम चढते ऊपर,

सामर्थ्य की अंतिम सीमाओं का स्पर्श कर,

बार-बार मन में आ कौंधती विरक्ति से संघर्ष कर,

शिखर पर खड़े हो कर,

जैसे ही जीवन सार्थक लगने लगता है,

और धन्यता का भाव चित्त में जगने लगता है,

एक अमूर्त जिज्ञासा सर उठाती है,

क्षण भर में सम्पूर्ण अस्तित्व को है झकझोर जाती है,

क्या यही है हासिल,

बस इतना ही?

हवा यहाँ निर्मल है,

पर थोड़ी विरल है,

उनमें शीतलता तो है,

पर साँसों में लगता अधिक बल है।

क्या गणणा कहीं छली गयी है?

चित्त की सहजता कहीं चली गयी है।

क्या और मूल्य चुकाना बाकी है अभी?

या बस इतना ही।

दृश्य मनोरम, स्वच्छ, धवल है,

हृदय धन्य है, पर तनिक विकल है,

क्या यह नियति का उपहास मुखर है,

कि जो कुछ भी दिखता सुन्दर है,

या तो छूट गया नीचे है

या फिर दिखता बहुत ऊपर है।

हासिल क्या, दूर है दिखती अपनी घाटी?

बस इतना ही।

चांद यहाँ से भी है दिखता,

पहले सा ही मगरूर,

और आकाश अभी भी है उतना ही दूर,

पास क्या है,

एक निजी कहानी और बहुत सारा अकेलापन है,

तीखी ढलानें हैं, गति पर बंधन है,

सिर्फ दिल में ही नहीं,

कदमों में भी एक कमजोरी-सी जगी है,

बहुत गहराई से अपनों की दुआ-बंदगी याद आने लगी है,

भ्रम में हूँ, क्या ऐसी नियति थी चाही?

बस इतना ही।

खड़े होकर उस तुंग शिखर पर,

चारों ओर फैलाते नजर,

सारा मान तिरोहित हो जाता है,

अब तक का सारा ज्ञान तिरोहित हो जाता है,

जहाँ तक आँखें देख पाती हैं,

अनगिनत शिखरों का समूह नजर आता है,

यह तो बस एक है,

ऐसे कितने ही शिखर और भी हैं,

जिसे आखिरी कह सकें,

ऐसा शिखर कोई नहीं है।

लघुता की यह टीस फिर कभी छूट नहीं पाती।

बस इतना ही।

कर संधान शिखर,

वहीं का होकर,

बीते की दीप्ति में चमकना यदि उद्देश्य न हो,

तो कदम थमे नहीं रह सकते,

मन मान न सकता किसी भी बंधन को,

यहाँ बहुत हैं क्षद्म, विपर्यय,

अद्भुत-सा एक छलना है,

यहाँ से आगे चलने का मतलब,

सिर्फ नीचे उतरना है।

अर्थ बहुत ही व्यापक है, है हार जीत की जायी।

बस इतना ही।

नत होता मन

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चेतना का सहज विस्तार दिखे तो,

हृदय चिर कृतज्ञ, उदार दिखे तो,

स्वागत में नये विचार दिखें तो,

मानवता का ललित त्यौहार दिखे तो,

प्रेनोन्मुख, उन्नत होता मन।

नत होता मन।

नाम या परिचय ज्ञात नहीं हो,

शत्रु या मित्र आभास नहीं हो,

मात्र करुणा से हो संचालित,

कोई ‘मैं हूँ तुम्हारे साथ’ कहे तो,

आभारी सतत होता मन।

नत होता मन।

भीषण झंझा, निविड़ अंधकार हो,

अंतिम दीये की बुझती लौ को,

हाथ भरे निधियों को तज कर,

हाथों से ढँक कोई बचा सके तो,

हो विभोर, प्रणत होता मन।

नत होता मन।

हो क्या भाषा जन से जन की,

क्या संभव परिभाषा जीवन की?

प्रश्न उठें, पर इससे पहले,

यदि बातें हों बस अपनेपन की,

हृदय सहज, सम्मत होता मन।

नत होता मन।

निर्बल जब निर्भय हो जाये,

बलशाली करुण, सदय हो पाये,

अपनी प्रतिष्ठा से पहले जब,

मन औरों के सम्मान को धाये.

द्रवित भाव शत्-शत् होता मन।

नत होता मन।