बालक और मैं

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क्या तुम भी मेरे जैसे ही थे?

प्रश्न सुन कर चौंक उठा।

सम्मुख एक नन्हा-सा बालक,

कुछ जाना कुछ अनजाना-सा,

कौतूहल से सराबोर था,

देख रहा वह मेरी ओर था।

.

कौतूहल से उपजा कौतूहल,

जिज्ञासा में भी सम्हल-सम्हल,

मैं चलके उसके पास गया,

झुका, उसके समकक्ष हुआ,

जितना सरल मैं हो सकता था,

होकर, मुस्काया और पूछ लिया,

क्यों लगा तुम्हे मैं उत्तर दूंगा?

पर चलो मैं तुमसे बात करूंगा।

.

क्या रात अंधेरे डर लगता था?

परछाईयाँ थीं हवा में दिखती,

रंग रूप बदलती, चलती फिरती,

पैर जमते और कोसों लम्बा,

घर तक का सफर लगता था?

क्या तुमको भी डर लगता था?

.

कहना चाहा, बिल्कुल सच है,

कैसे सवाल ये गढ रहे हो,

तुम कैसे मुझको बिन जाने,

मेरा बचपन पढ रहे हो?

पर हिचका,

अपने कवच मैं खोल न पाया,

लगा सम्हालने अपने कद को,

उतना सच मैं बोल न पाया।

बच्चे ने जाने क्या समझा,

भायी शायद मेरी चुप्पी,

और फिर से वह लगा पूछने,

सुबह-सुबह की नींद का टूटना,

क्या तुमको भी लगता सबसे बड़ा दुख था?

समय की सीमा भूल खेलना,

नहीं क्या साक्षात सुख सम्मुख था?

.

आँखें मेरी भर-भर आयीं,

हाँ, मैं तेरे ही जैसा था,

शायद हर कोई होता है,

कहना चाहा तभी लपक कर,

मेरे कानों में मुझ को छू कर,

धीमे से वह फुसफुसाया,

जैसे अपनी किसी साजिश का,

सहज सहभागी मुझे बनाया।

बड़ा होना कैसा होता है?

क्या सबकुछ अलग जैसा होता है?

क्या बड़ों की बातें बड़ी होती है?

वे काम बहुत ही भारी करते,

क्या खेल-खुशी भी ज्यादा होती,

या हमसे भी हैं ज्यादा लड़ते?

.

अब कितना कुछ था कहना मुझको,

पर पहला सिरा नहीं मिल पाया,

बच्चा आगे गया बोलता,

मेरा सुनते जाना और भी भाया।

क्या अच्छा लगना अच्छा लगता है?

क्या मन उसे ढूँढता रहता हर क्षण?

बुरी जो लगती उन बातों से क्या,

हैं दूर भागते बड़े भी हरदम?

बच्चा यूँ कहता ही जाता,

पर मैंने बीच में टोक दिया,

कोई बांध हृदय में टूट रहा था,

बड़े जतन से रोक लिया।

.

हाँ, मैं तेरे जैसा ही था,

शुरु में सब ही खरे होते हैं।

सबसे अच्छा बनने के सपने,

देख-देख बड़े होते हैं।

बड़े होने में तन खिंचता है,

तन के संग मन भी खिंचता है,

और इस खिंचाव पर कई बार,

नहीं रहता अपना कोई अख्तियार,

एक सिरा सम्हालो तो

दूसरा पकड़ से फिसल जाता है,

लगता है सब है सधा हुआ,

पर हाथ से सब कुछ निकल जाता है।

अंत में जो संग बचता है,

तुम्हारी पहचान बन जाता है,

असली रंग रूप से भले तुम्हारे,

नहीं कोई इसका नाता है,

अच्छा लगना अभी भी अच्छा लगता,

पर अच्छे का चेहरा जटिल हो गया है,

बुरा लगना भी बुरा ही लगता,

पर व्यवहार इसका कुटिल हो गया है,

हाँ, एक और बात,

जो नहीं रह सकता बिना बताये,

कह लेने दो ताकि मेरी,

बात अधूरी ना रह जाये।

तुम्हें अच्छे याद देर तक रहते,

तुम बुरे को जल्दी भूल हो जाते,

हम अच्छे को बहुत परखते,

अच्छा मानने से हैं कतराते,

बुरे को जिन्दगी भर मन में पालते,

पिला पिला कर खून जिलाते।

.

बच्चा थोड़ भ्रमित-चकित-सा,

एक पल मुझको रहा निहारता,

बोला मुड़कर अपने बचपन में,

क्या रूठना और मनाना,

बड़े भी करते हैं अनबन में?

क्या अब भी वैसे ही हक से,

अब भी प्यार जताते हो,

क्या कुछ अच्छा नहीं लगता तो,

खुलकर तुम बतलाते हो?

.

बच्चा रुका, तो मैं भौंचक था,

रहा निहारता उसको कुछ पल,

चाहा उत्तर ना दूँ कोई,

पर कर न पाया मैं ऐसा छल।

रुका, साँस ली, आँखों के जल को,

दिया सूखने, और फिर बोला,

पता नहीं कैसे पायी हिम्मत,

इसबार नहीं बदल पाया चोला।

जैसे जैसे हम बढते हैं,

रूठते तो नहीं बताते हैं,

और मनाये जाने का हक,

हरदम अपना ही जतलाते हैं,

कोई मुझसे क्यों कर रूठे,

मैं तो सदा सही करता,

रही बात मनाने की तो,

करता नहीं, बस दम भरता।

जो अच्छा नहीं लगे बतलाना,

उसे असंगत कहने लगते हैं,

आभार मानना, प्यार जताना,

हमें भावुकता लगने लगते हैं।

.

मैं ठिठका, बच्चे को देखा,

आखिर क्या यह कर रहा हूँ,

बाल सुलभ जिज्ञासू मन में,

हताशा अपनी क्यों भर रहा हूँ।

छिपा-छिपा हारों को अपनी,

कह रहा सब विधि का लेखा।

मैंने फिर से बच्चे को देखा।

.

आँसू बहने लगे धार-से,

गले लगा कर सहज प्यार से,

उसकी आँखों मे मुस्काया,

मन की बात कहने पर आया।

जो तुम देख रहे हो सच है,

जो हुआ है अब तक उसका फल है।

व्यक्ति हारते, सपने मरते,

हर दौर गुजरता लड़ते-लड़ते।

पर कुछ है जो कभी न मरता,

अच्छे में विश्वास अडिग हो,

तो पराजय से भी विश्वास उभरता।

मानव सिमित है, चूक है सकता,

पर कभी न हारती मानवता,

जब तक तुम हो प्रश्न तेरे हैं,

प्रगति के पथ पर तू है चलता।

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One thought on “बालक और मैं”

  1. बचपन सच में इंसान का सबसे सहज और सरल रूप दिखलाता है। बहुत उम्दा कविता🌼

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