दुनियाँ

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ये दुनियाँ कोई सराय नहीं है,

जहाँ रात गुजारने को ठहर गये,

थके तो रुक गये,

और चले जब जी चाहा, पहर दो पहर गये।

 

ये दुनियाँ कोई खेल का मैदान नहीं,

कि जी चाहा तो खेले,

नहीं तो बैठ गये बनके महज एक तमाशबीन,

कि लुत्फ बस मेरा, बाकी जिसका वो झेले।

 

मैदान यह किसी जंग का भी नहीं है,

जहाँ हों बस दो ही खेमे, एक बदी हो एक ईमान हो,

लड़ने या छोड़ने की खुली छूट हो,

और पहले से ही दुश्मनों की पहचान हो।

 

ना ही है यह कोई नुमाइस

रंगबिरंगे खिलौनों की, दिलफरेब और नये-नये,

कि कुछ को देखा, कुछके लिये रोये,

फिर जो मिला, सब कुछ भुला बस उसी के हो लिये।

 

यह बिल्कुल नहीं अनगिनत लहरों का कोई समुंदर,

जहाँ कदमों के निशान बहुत सारे हों,

बिखरी पड़ी खुबसूरती हो, थकाती लहरों की अठखेलियाँ हों,

और जब होश आये तो सुस्ताने को किनारे हों।

 

यह हर ओर जाती हुजूमों का मेला भी नहीं,

जहाँ यूँ तो हर कोई चलता नजर आता है,

पर कोई कहीं पहुंचने की जरूरत में नही दिखता,

गुमनाम सा दिन सारा हैरानी में गुजर जाता है।

 

यह सीधा साधा गणित नहीं, जहाँ दो और दो सिर्फ चार होते हैं,

हल करने के तरीके और जवाब तयशुदा होते हैं,

या फिर किसी रूहानी बहस मुबाहसे की शाम भी नहीं,

जहाँ एक सब एक ही सुर मे बोलते हैं, और सबके खयाल जुदा होते हैं।

 

दुनियाँ इतना ही नहीं, उतना भी नहीं,

यह सब कुछ और औरभी बहुत कुछ है,

जिसे हम छू नहीं पाते हैं, जान नहीं पाते हैं,

जो दिखता नहीं पर मौजूद सचमुच है।

 

यह दुनियाँ दरअसल हम सबको मिली हमारी जिन्दगी है,

बनी चहे जैसे भी, हर पल हमारे हाथों यह बनती है।

 

तुम इसे गुजरगाह नहीं, अगर अपना घर बनाओ,

हँसो, रोओ, लड़ो, खेलो और इसका हिस्सा हो जाओ,

खुद को तलाशो और हो सके तो इस तलाश में खो जाओ,

फिर जब थको तो बिना किसी फिक्र के सो जाओ?

 

तनी हुई रस्सी पर नट के पाँव,

तालियाँ बजाता, तमाशा देख रहा सारा गाँव,

किसको प्यारे ऐसे जमघट नहीं?

फिर क्यौं इस दुनियाँ में तमाशबीन हों हम, नट नहीं?

 

जीना सीखेंगे अगर औरों के जंग देखकर,

चुभता रहे एहसास कि जिन्दगी परायी सी गयी गुजर?

तो बहाना लहू और पसीना अच्छा है,

कीमत की क्या फिक्र, अगर लगे इस तरह जीना सच्चा है।

 

जिद ऐसी कि कोशिश हासिल करने की कयामत तक,

अगर नहीं तो क्या बने और बने ही क्यौं?

खिलौने, खयाल, खूबसूरती, होती सस्ती तो नहीं,

हक जतायें, हम पहले तो उसके काबिल भी हों।

 

यह दुनियाँ दरअसल हम सबको मिली हमारी जिन्दगी है,

समेटो मत सँवारो, कि इसके हुस्न में नहीं कोई कमी है।

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